विश्वास नहीं होता कि आज का पढ़ा लिखा नवयुवक, बीसवीं शताब्दी की कुंठित, दबाव वाली – “लूण-लोटा” वाली घटिया राजनीति खेलते हैं। ऐसी राजनीति से बचें। ये राजनीति, भारत के संविधान द्वारा दिए गए मेरे “गुप्त मतदान” के अधिकार के खिलाफ़ है। मुझे दुःख होता है जानकर कि ये राजनेता भारत के संविधान से अधिक, इस कुंठित सोच में विश्वास रखते हैं।
मुझे आज यह कहने में खेद नहीं कि मैं ऐसे राजनेताओं से दूर रहना चाहता हूँ जो भारत के संविधान के खिलाफ़ हैं और उस संविधान की रक्षा करने में असक्षम हैं और उस संविधान का अपमान करते हैं
राजनीति और देवनीति को मिश्रित करने वाले उन राजनीतिज्ञों से मैं एक प्रश्न पूछना चाहूँगा – आप ने जिस देव/देवी की कसम खा कर लूण-लोटा किया है और अपने वोट को गुप्त न रख के पब्लिक कर दिया है, क्या आपने उस देव/देवी को जगा कर, उसके माली/गूर द्वारा ये एक बार भी पूछा कि क्या वो आपकी इस लूण-लोटा वाली घटिया व कुंठित राजनीति का साक्ष्य बनना चाहता है, या चाहती है? एक बार जरूर पूछ के देखना।
पोस्टर पर तो “नई सोच” का ढिंढोरा सब पीट रहे हैं, परन्तु क्या ये सचमुच नई सोच है? फैसला स्वयं करें। क्या आप एक रूढ़िवादी उम्मीदवार को अपने सर पर पाँच साल के लिए बिठाना चाहेंगे? अगर आप सचमुच क्षेत्र का विकास चाहते हैं तो सचमुच की नई सोच को अपनाएं। दिखावे और ढकोसलों से दूर रहें। शिक्षित और ज्ञानी होने में धरा-अम्बर का भेद है। आपका मत कीमती है। उसे व्यर्थ न गंवाए। सोच समझ कर अपने ज्ञान का उपयोग करके योग्य उम्मीदवार को चुनें। किसी रूढ़िवादी सोच को नहीं।
सोचें, समझें। आत्मचिंतन करें। हम इस समाज को 22वीं शताब्दी की ओर ले जा रहे हैं या 20वीं शताब्दी की ओर? हमारी शिक्षा हमें एक विकसित समाज की ओर ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है। मुझे गर्व है कि मैं इस कुरीति का भागीदारी नहीं बना। परन्तु दुःख भी है कि इसकी कीमत मुझे रिश्तों में दरार से चुकानी पड़ी। परिवार वालों को जो गाली गलौच झेलना पड़ा वो अलग। परन्तु मुझे गर्व भी है कि मैंने अपने सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं होने दिया और न ही किसी को उन सिद्धांतों को कुचलने दिया। मुझे अपनी शिक्षा और संस्कारों पर गर्व है। मुझे एक फिल्म के dialogue की याद आ रही है जिसमें Nawazuddin Siddique कहते हैं कि भगवान के भरोसे मत बैठिए। क्या पता वो तुम्हारे भरोसे बैठे हो।
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