निराला जी की पत्थर तोड़ने वाली औरत को आज घर जाना नसीब हुआ है। वो कई सौ किलोमीटर का सफ़र पैदल चलना चाहती है। सरकार ने उसके लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन लगाई है। परन्तु उसे पैदल चलना अधिक पसन्द है। जिन राजमार्गों पर उसने रेत, पत्थर, सीमेंट ढोया है, वो उन पत्थरों से मिलना चाहती है।

वो कन्धे पर बैठे, और दो पैदल चलते हुए बच्चों को – उसके द्वारा भारत निर्माण में बनाए गए बड़े बड़े पुलों को दिखाना चाहती है। बच्चे भूखे प्यासे हैं। उन्हें लगता है माँ स्वार्थी है। खाना नहीं दे रही है। परन्तु माँ को किसी पत्रकार ने बताया है कि सरकार ने उनके लिए मुफ़्त राशन का इंतज़ाम किया है। यही उसका पुरस्कार है। वो बच्चों को घसीटे जा रही है कि अगले शहर में उसके लिए ताली बजायी जाएगी, थाली में खाना होगा, और रास्ते में सेना ने उसके बच्चों के लिए फूल बिछाये होंगे, जिससे उसके बच्चे अपने पाँव के छालों को भूल जाएंगे।

आश्चर्य है कि निराला जी की वो पत्थर तोड़ने वाली औरत आज भी ज़िन्दा है और अभी भी युवा है। वही श्याम तन है। लेकिन घर जाना उसे आज नसीब हुआ है। उसे किसी पत्रकार ने ये भी बताया है कि उसके घर के राज्य की सरकार, उसके कौशल के अनुसार काम देगी ताकि उसे प्रवासी न बनना पड़े। वो खुश है, वो फ़िर से पत्थर तोड़ेगी।