बर्फ की चादर उतार
पर्वत खड़े नग्न इस बार।
इसे उनकी बेहयाई कहूँ
या मनुष्यों द्वारा बलात्कार?

सिकती रोटी सी है धरा
जलने में अभी देर ज़रा।
अंगार फूँक कर स्वयं ही
मानस खड़ा अब डरा डरा।।

नदी स्तनों की काई सूखी
दुग्ध बिन मीन भूखी।
चीर हरण कर स्वयं ही
मगर की भी आँखें रूखी।।