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Author: Dhaleta Surender Kumar

कविता

कातिब इज़हार-ए-पर्ची 

बेकराँ बेकरारे दिल मेरे लिए कातिब इज़हार-ए-पर्ची मेरी किसी सहीफे में डाल कर भूल जा। शब-ए-फुरकत का जागा सफ्हा पलटता आ जाऊँ कभी हैरत में।। – ०५/१०/२०१२
कविता

इति 

रंगा बिल्ला दो उपन्यासकार विकृत करते न केवल इतिहास वेद पुराण उपनिषद स्मृति बदल रहे सबकी परिभास जब ज्योति ज्यो इति हो गई तो अमर जवान भी अ मर हो गया सद्गतिरंगाबिल्ला असत्यर्गमय अमृत्योरंगाबिल्ला मृत्योर्गमय ज्योतिरंगाबिल्ला तमसोर्गमय