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Author: Dhaleta Surender Kumar

कविता

मैंने भी जलाये थे दिये 

मैंने भी जलाये थे दिये ये सोच कर — रौशन कर दूँगा पथ वैतर्णी तक। 109 आत्माओं का रास्ता सुगम कर इस लोक से परलोक तक।। क्या पता था मुझे शोक नहीं जश्न मनाना था। समर गीत नहीं डिस्को बजाना था।। मैंने भी जलाये थे...
कविता

मोदी है तो मुमकिन है 

दुश्मन बैठा बार्डर के पार है उसके पास एक राडार है। हमारा लड़ाकू जहाज़ भी तैयार है। आसमान में काली बदली सवार है, परन्तु हमारा पी-एम भी होशियार है। उसकी वाणी में बीट्‍स झनकार है। बोला, “भाग्य को हमारा नमस्कार है। ये तो साक्षात चमत्कार...