Stay connected

Blog

लोक गीत

लाए तू मेरे हाथो दे मैंहदे भाभिए 

शेखर मास्टा व सुरेन्द्र कुमार ढलेटा — २५ मार्च १९९९ लाए तू मेरे हाथो दे मैंहदे भाभिए, मेरी दाई रे ऋ हाए रे मेरी दाई रे शादे रे भाभिए, मेरी दाई रे। इणे मिलौले ना बाण्ठणे भाभिए, जिणे औसौ हाए जिणे औसौ मेरे दादे रे...
लोक गीत

देख तू लाड़िए 

शेखर मास्टा व ढलेटा सुरेन्द्र कुमार — १९९९ शादिए आशै आमै हेरे भाइयौ,‍‍ देखो लाड़े री ज़ानी रे। देख तू लाड़िए लाड़ी ताखू भी छोड़िओ, देख लाड़े खी ढौबो हाए तेरे नानी री॥ देख तू लाड़िए घोड़ी गाशी आशो लॅंगड़ो लाड़ो, देख कौर दो शादीए,...
कविता

हिमल तुझे पुकार रहे 

पग निष्कासित कर देहलीज़ से हिमल तुझे पुकार रहे। क्यों सिसकता चौ भीति भीतर, उन्मुक्त गगन में फुँफकार रे। चिंतन उत्सर्ग कर व्यर्थ का हो कंठित खग-भाखी में। क्यों आत्मदाह इतिहास पृष्ठ पर हो जीतक चिरस्थायी साखी में। इन्द्रचाप सतरंगी है तू सेतू धरा-आकाश पे।...
कविता

नई धार 

— १७ नवम्बर २००१ समय की धार के इस पार मैं खड़ा, तुम उस पार। मैं तरूँ, थोड़ा तुम आ जाओ। आ बह निकलें इस धार संग। नहीं। मैं तरूँ उस ओर या तुम इस छोर आ बस जाएँ हम किनारे पर। बह जाने दो...
कविता

स्वप्न आते हैं? 

— ९ नवम्बर, २००१ कौन कहता है स्वप्न आते हैं? अगर इसे घर कहूँ तो घर के एक कोने में अलमारी सदैव बंद रहती। दिन उसके छिद्रों में प्रति संध्या विश्राम करता। एक दिवस उत्सुक्ता ने उसे खोला तो वह गर्द के गुबार में दब...
कविता

जब मुझको गुस्सा आता है 

— ०९ मई, २००३ जब मुझको गुस्सा आता है कोई फूल कुम्हला जाता है। क्या सुबह की ओस पड़ी थी? वह तो आँसुओं की झड़ी थी। चलते जब शब्दों के बाण निकलते तब उन के प्राण कोई मन ही मन करहाता है जब मुझको गुस्सा...
कविता

दूरियाँ 

— २० नवम्बर २००१ न ही कोई पत्र आया न ही कोई दूरभाष। दिन गुज़र जाएँगे फिर भी बैठेंगे हम लगाए आश। क्या आलस ने है घेरा? या हो फिर हमसे नाराज़। तरस तरस गए हम सुनने को तुम्हारी आवाज़। दूरियाँ हमने दिन में नापी...
कविता

निष्ठुर 

— १ दिसम्बर २००१ मैं अकेलेपन की चादर ओढ़ सर्दी में रहा ठिठुर। तू स्तनों में ताप लिए दूर खड़ी ललचाए निष्ठुर। मैं रद में हिम का ओज लिए गा रहा विरह रागिनी। तरसाए तेरी तपती सॉंसों पर तॉंडव करती स्तनाग्नि। आ अपनी बाहें फैलाकर...
कविता

बच्ची ही तो हो 

— १ दिसम्बर २००१, ०१२० घंटे तेरे बचपन की नादानियॉं तेरे हाथों से कब छूटे? बच्ची ही तो हो। यह समझ लिया, तो कैसे रूठें? पकड़ लूँ बँह या बाल अंगुली खेलूँ तुमसे या प्यार करूँ? बच्ची ही तो हो। यह समझ लिया, तो कैसे...
कविता

अर्चना – एक वृक्ष 

— ७ – ११ -२००१ प्राक्कथन की याचिका थी शब्दों का प्रयास। कब अध्याय बन गए सम्बन्धों का उपन्यास। निम्न छाया का प्यासा था एक पत्र भी अधिक था। शीत आहों का कुहासा लिए पूरा वृक्ष ही मिल गया। शुष्क ओष्ठ पर मेरे मखमली पत्रों...
कविता

अर्चना 

–१७ नवम्बर २००१ बेचैन कर रही तेरी याद दिल को चीर कर एक आवाज़। पुनः पुनः पुकार रही अर्चना। अर्चना। अर्चना। इन पर्वतों से टकराकर प्रतिध्वनि मस्तिष्क पर। हथोड़ों सी चीख रही अर्चना। अर्चना। अर्चना। मेरी सॉंसों ने मध्य रात्रि में जगाया तेरा नाम आलाप...
कविता

तीज 

मैं भागा-भागा पपीहर पाछे सुनने कहुक मधुर पुकार। वो बैठा – बस बाँह तेरे चूड़ियों में छुप छनकार॥ छन-छन, छन-छन, रंजन मन लाल-नीले छनके अलंकार। हलहला! हलचल! हाए! हिय! काहे कचोए काँच कतार? संग-संग, चल-चल, चहकी चंचल मैं तीज बैठी, सजन संवार। थाम कलाई, आ...